1988 बैच के दो दोस्त, एक बना हीरो, एक हुआ जीरो – BDA ने लिखी ईमानदारी की हार की कहानी
यदि बीडीए के सचिव, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ईमानदार होते, तो प्राधिकरण की स्थिति आज यह न होती और हरिओम गुप्त जैसे अधिकारियों को प्रताड़ित नहीं होना पड़ता।
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती विकास प्राधिकरण में ईमानदारी बनी सजा? दो अधिकारियों की कहानी ने खड़े किए गंभीर सवाल
- ‘बीडीए में ईमानदारों के लिए नो वैकेंसी, बेईमानों के लिए वैकेंसी ही वैकेंसी’ का आरोप
बस्ती। बस्ती विकास प्राधिकरण (बीडीए) की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि प्राधिकरण में ईमानदार अधिकारियों को प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है, जबकि भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलने वालों को खुला संरक्षण मिल रहा है।
मामला गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक गाजियाबाद से 1988 में एक साथ पास हुए दो अधिकारियों – हरिओम गुप्त और अनिल कुमार त्यागी की प्रशासनिक यात्रा से जुड़ा है। दोनों ने एक ही संस्थान से शिक्षा ली, लेकिन बीडीए में दोनों के रास्ते पूरी तरह अलग हो गए, जो मौजूदा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
ईमानदारी की भारी कीमत: प्रताड़ना और अपमान
- जहाँ एक ओर अनिल कुमार त्यागी ने ईमानदारी का कड़ा रास्ता चुना, वहीं उन्हें इसके एवज में भारी प्रशासनिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
- ईमानदारी पर अडिग रहने के कारण उन्हें सात साल तक लगातार निलंबित रहना पड़ा, क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलने से इनकार कर दिया था।
- बीडीए कार्यकाल के दौरान उन्हें एक बार नहीं, बल्कि तीन-तीन बार मारपीट का सामना करना पड़ा और भवन स्वामियों से प्रताड़ित कराया गया। यहाँ तक कि कार्यालय परिसर में उनका मोबाइल तक छीन लिया गया।
- उनकी विदाई इतनी खामोश और अपमानजनक रही कि किसी को यह तक पता नहीं चला कि वे कब और कैसे बस्ती से चले गए।
ईमानदारी की कीमत : 7 साल निलंबन और मारपीट के आरोप
सूत्रों और प्राप्त जानकारी के अनुसार, जेई अनिल कुमार त्यागी ने ईमानदारी के रास्ते पर अडिग रहने का प्रयास किया। आरोप है कि इसी कारण उन्हें लगातार 7 साल तक निलंबित रहना पड़ा।
रिपोर्ट के अनुसार बीडीए में अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें तीन बार भवन स्वामियों द्वारा मारपीट का सामना करना पड़ा और कार्यालय परिसर में उनका मोबाइल तक छीन लिया गया। आरोप है कि उन्हें सुनियोजित तरीके से प्रताड़ित कराया गया। उनकी विदाई भी बेहद खामोश और अपमानजनक तरीके से हुई।
दूसरी तस्वीर : तबादले पर शानदार विदाई और तोहफों की बौछार
इसके ठीक विपरीत दूसरी तस्वीर सामने आई है। आरोप है कि कथित तौर पर भ्रष्टाचार में लिप्त रहे एक एक्सईएन के तबादले पर उन्हें बीडीए में बेहद शानदार विदाई दी गई और महंगे तोहफे भेंट किए गए।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि बीडीए में कनिष्ठ अभियंता (जेई) के पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलने वाले कुछ अधिकारी तरक्की पाकर प्रभारी एक्सईएन के पद तक पहुंच गए, जबकि ईमानदार छवि वाले अधिकारी अपने मूल पद पर ही बने रहे।
भ्रष्टाचार का बोलबाला और विदाई में तोहफों की बौछार
- इसके विपरीत, जो लोग कथित तौर पर भ्रष्टाचार के रास्ते पर चले, उन्होंने अकूत संपत्ति अर्जित की और संस्था में पूरा मान-सम्मान हासिल किया।
- जब एक भ्रष्ट एक्सईएन का तबादला हुआ, तो उन्हें न केवल बेहद शानदार विदाई दी गई, बल्कि महंगे-महंगे तोहफे भी भेंट किए गए।
- रिपोर्ट के अनुसार, बीडीए में बेईमानों की पूजा होती है क्योंकि वे सबकी जेबें भरते हैं, जबकि ईमानदारों को हेय दृष्टि से देखा जाता है।
- भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलने वाले कनिष्ठ अभियंता (जेई) तरक्की पाकर प्रभारी एक्सईएन के पद तक पहुँच गए, जबकि ईमानदारी का दामन थामने वाले जेई अपने मूल पद पर ही रह गए।
अवैध निर्माण और प्लाटिंग का खेल
आरोप है कि प्राधिकरण क्षेत्र में अवैध कॉलोनियों, अवैध प्लाटिंग और अवैध निर्माण का खेल धड़ल्ले से चल रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि बीडीए के सचिव, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष स्तर पर सख्ती और ईमानदारी होती तो इस तरह के मामलों पर अंकुश लग सकता था।
स्थानीय मीडिया में कवरेज न होने का आरोप
इस पूरे मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि कमिश्नर, डीएम और एडीएम की बीडीए में प्रशासनिक भागीदारी के कारण स्थानीय स्तर पर इन मामलों को वह प्रमुखता नहीं मिल पाती जिसकी जरूरत है।
फिलहाल, दो समकक्ष अधिकारियों की यह दो अलग-अलग कहानियां बस्ती विकास प्राधिकरण की कार्यसंस्कृति पर बड़ा सवालिया निशान लगा रही हैं। इस संबंध में बीडीए के उच्चाधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।













